हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, रमज़ान का महीना हिकमत और अलवी अंतर्दृष्टि की एक अदित्तीय खज़ाना से परिचित होने का उत्तम अवसर है। विशेष कार्यक्रम अलवी ज़ियाफ़त मे नजहुल बलाग़ा की कुछ हिकमतो को नहजुल बलागा के विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम जवाद मोहद्देसी की शरह के साथ पेश किया जा रहा है। ताकि प्रिय पाठक अफ़तार के क्षणो मे इन मआरिफ़ से लाभांवित हो सकें।
अमीरुल मोमेनीन हज़रत अली (अ) नहजुल बलाग़ा की हिकमत न 106 मे फ़रमाते हैः
وَ قَالَ (علیه السلام): لَا یَتْرُکُ النَّاسُ شَیْئاً مِنْ أَمْرِ دِینِهِمْ لِاسْتِصْلَاحِ دُنْیَاهُمْ، إِلَّا فَتَحَ اللَّهُ عَلَیْهِمْ مَا هُوَ أَضَرُّ مِنْهُ
अनुवादः हज़रत अली ने फ़रमायाः लोगो जब भी अपनी दुनिया की इस्लाह और बेहतरी के लिए अपने दीन के किसी हिस्से को छोड देते है तो उसके परिणाम मे अल्लाह तआला उन पर ऐसी मुसीबत या नुक़सान का दरवाज़ा खोल देता है जो इस दुनिया को छोड़ने से भी अधिक हानिकारक होती है।
इस हदीस की व्याख्या यह है कि इंसान के जीवन मे कभी ऐसे अवसर आते है जब वह एक दोरास्ते पर खड़ा होता हैः क्या वह अपने धर्म को प्राथमिकता दे या सांसारिक लाभो को । प्रशन यह होता है कि इंसान किस चीज़ को दूसरी के लिए क़ुरबान करे?
वास्तविकता यह है कि जीवन मे हम अधिकतर एक चीज को दूसरी चीज़ के लिए क़ुरबान करते है। उदाहरण के लिए यदि इंसान मरीज़ हो जाए तो हालाकि उसके लिए पैसा मूल्यवान होता है, लेकिन स्वास्थ उससे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए वह अपना सारा धन खर्च कर देता है ताकि उपचार करवा कर स्वास्थ प्राप्त कर सके।
असली प्रश्न यह है कि धर्म को प्राथमिकता दी जाए तो दुनिया को?
क्या हम दुनिया को अपने धर्म पर क़ुरबान करे या धर्म को अपनी दुनिया के लिए क़ुरबान कर दें?
अमीरुल मोमेनीन के शब्दो का केंद्र यही है कि कुछ लोग अपनी दुनिया की बेहतरी के लिए धर्म को क़ुरबान देते है। अर्थात वह चाहते है कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो, जीवन अधिक आराम से गुजरे, अच्छी आमदनी प्राप्त हो, बड़ा घर हो, मूल्यवान वाहन हो, अच्छा खाने पीने की चीजे हो और समाज मे उच्च स्थान प्राप्त हो।
इस उद्देश्य के लिए वह अपने धर्म से समझौता करते है। अर्थात वह धर्म को बेचकर दुनिया को आबाद करना चाहते है। परिणाम यह निकलता है कि न केवल उनका धर्म तबाह हो जाता है बल्कि दुनिया मे भी ऐसे नुक़सानात का सामना करना पड़ता है जिनका उन्होने कभी सोचा भी नही होता।
अतः जब इंसान धर्म और दुनिया के बीच दोराहे पर खड़ा होता है तो उसे चाहिए कि धर्म को प्राथमिकता दे और अगर कु़रबानी देनी पड़े तो दुनिया की दे, ताकि उसका धर्म सुरक्षित रह सके।
हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने भी अपने दुशमनो के बारे मे एक अवसर पर फ़रमायाः
إنَّ الناسَ عَبیدُ الدُّنیا و الدِّینُ لَعقٌ علی ألسِنَتِهِم یَحوطُونَهُ ما دَرَّت مَعائشُهُم، فإذا مُحِّصُوا بالبلاءِ قَلَّ الدَّیّانُونَ
अनुवादः लोग दुनिया के ग़ुलाम है और धर्म केवल उनकी ज़बानो तक सीमित है। जब तक धर्म के माध्यम से उनके मफ़ादात पूरे होते रहते है वह उसका ज़िक्र करते रहते है, लेकिन जब परीक्षा का समय आता है तो हक़ीक़ी दीनदार बहुत कम रह जाते है।
जब परीक्षा का चरण आता है तो दीनदारो की संख्या कम हो जाती है। उदाहरण के लिए उमर साद ने वह गंभीर अपराध क्यो किया और इमाम हुसैन (अ) को शहीद करने मे क्यो सम्मिलित हुआ? उसका कारण केवल यह था कि उसे रैय की गर्वनरी हासिल करने का प्रलोभन था। उसके समीप रैय की हुकूमत इतनी अधिक आर्कषक थी कि वह उससे दस्तबरदार होने के लिए तैयार न हुआ।
इस प्रलोभन मे इसने कर्बला के लशकर का नेतृत्व स्वीकार किया, युद्ध किया और इमाम हुसैन (अ) और उनके वफ़ादार साथीयो को शहीद कर दिया। वह भी उन लोगो मे से था जिन्होने दुनिया प्राप्ती के लिए धर्म को क़ुर्बान कर दिया। लेकिन परिणाम यह हुआ कि न केवल दुनिया प्राप्त कर सका और न ही उसके पास धर्म बाकी बचा।
अतः धर्म और दुनिया के इस दोराहे पर हमे प्रयास करना चाहिए कि दुनिया के लिए धर्म को क़ुर्बान न करें, बल्कि अगर जरूरत पड़े तो दुनिया को छोड़ दे ताकि हमारा धर्म सुरक्षित रह सके।
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